महाराणा कुम्भा के जीवन की पूरी जानकारी Maharana Kumbha

महाराणा कुम्भा फोटो - Maharana Kumbha image

नमस्कार दोस्तों आज हम महाराणा कुम्भा के जीवन के बारे में विस्तार से जानेगे ! महाराणा कुम्भा एक महान शासक था 1403 ई को महाराणा कुम्भा का जन्म हुआ और 1433 में राणा कुम्भा का राज्याभिषेक हुआ ! और मेवाड़ में राठौड़ों के बढ़ते प्रभाव को समाप्त किया 

महाराणा कुम्भा का व्यक्तित्व परिचय Maharana Kumbha in hindi

नाममहाराणा कुम्भा
जन्म1403 ई.
राज्याभिषेक1433 में
राजवंशसिसोदिया राजवंश
कुम्भा के पुत्रराणा रायमल, उदयसिंह प्रथम
पितामहाराणा मोकल
मातासौभाग्य देवी
रानियां1600
पोते और नातीराणा संगा, जयमल मेरतिया, Jaimal
Maharana Kumbha in hindi

महाराणा कुम्भा एक महान शासक, महान सेनाध्यक्ष, महान निर्माता तथा वरिष्ठ विद्वान् था वह राणा कुम्भा वीर तथा साहसी था ! उसका पिता उसके लिये मेवाड़ पर चारों तरफ से मंडराते विपत्ति के बादल छोड़ गया था ! उसने धैर्य व साहस के साथ आन्तरिक विद्रोहों का दमन किया ! मेवाड़ पर राठौड़ों के बढ़ते हुए प्रभाव को समाप्त किया ! तथा विदेशी मुसलमानों के आक्रमण का उसने सफलतापूर्वक सामना किया !

अपने शासन के दीर्घ काल तक उसने मालवा व गुजरात के मुस्लिम शासकों का डटकर मुकाबला किया ! और बून्दी के हाड़ा,सिरोही के देवड़ा तथा सोजत व मण्डौर के राठौड़ राजपूत ठिकानों को परास्त कर ! उन्हें अपनी अधीनता स्वीकार करने को बाध्य किया !

अपने राज्य को विस्तृत किया इतना विस्तृत राज्य मेवाड़ में पहले किसी का नहीं था ! इसी कारण कुम्भलगढ़ प्रशस्ति में उसे धर्म और पवित्रता का अवतार कहा गया है ! साँगा तथा राजसिंह की ख्याति की आधारशिला कुम्भा के समय में ही डाली गई थी ! इतिहास के अनुसार उसने अपने राज्य को सुदृढ़ दुर्ग द्वारा सम्पन्न बनाया और ख्याति अर्जित कर ! अपने नाम को चिर-स्थायी बना लिया !

राणा कुम्भा प्रजा का हितेसी और दानवीर (Maharana Kumbha’s benefactor and charity of the people)

जहाँ राणा अपने राज्य की रक्षा के लिए सजग था वहीं वह प्रजा हित के लिए भी जागरूक था ! युद्धों में निरन्तर व्यस्त रहने के उपरान्त भी उसने जनहित की दृष्टि से अनेक जन-कल्याण-कार्यों को सम्पूर्ण किया ! उसने जल-व्यवस्था के लिए अनेक तालाबों, कुण्डों, कूपों तथा बावड़ियों का निर्माण करवाया ! वह दानवीर भी था उसकी तुलना राजा भोज तथा कर्ण जैसे दानवीरों से की गई है !

इसलिए  कुम्भलगढ़ प्रशस्ति में कवियोंने उसे प्रजापालक तथा महान दानी कहा है ! धार्मिक क्षेत्र में वह निःसन्देह एक धर्म परायण व्यक्ति था, परन्तु अन्य धर्मों के प्रति भी वह सहिष्णु था ! उसने मुसलमानों पर कभी केवल विधर्मी होने के नाते अत्याचार नहीं किये ! और कुम्भा वंश परम्परा से शैव-मत का मानने वाला था ! तथा उसने वैष्णव धर्म के प्रति भी उतनी ही श्रद्धा व्यक्त की !

आबू तीर्थ पर जाने वाले जैन यात्रियों से जो कर लिया जाता था वह कर उसने समाप्त कर दिया ! उसने जैन, शैव तथा वैष्णवमन्दिरों का निर्माण करवाया ! वास्तव में उसकी नीति सर्वधर्म-समभाव की नीति थी ! महाराणा कुम्भा में लोकप्रियता के गुण विद्यमान थे ! वह प्रजा की सुविधाओं तथा भावनाओं की ओर ध्यान देता था ! इसलिए प्रजा भी उसमें श्रद्धा रखती थी ! वास्तव में कुम्भा का व्यक्तित्व सर्वतोमुखी था ! अपनी महानता दर्शाने हेतु उसने अपने को कई ! 

महाराणा कुम्भा की महान उपाधिया (Great titles of Maharana Kumbha)

महाराणा कुम्भा अपने को कई महान उपाधियों से अलंकृत भी किया ! उसकी उपाधियों का ज्ञान हमें कुम्भलगढ़  से होता है !

  • उपाधिया
  • महाराजाधिराज
  • रायरायन
  • राणो रासो
  • महाराणा राजगुरु
  • दानगुरु
  • परम – गुरु

यह सब कुम्भा की उपाधियाँ है और रसिक-प्रिया रचना में भी और अधिक उपाधियाँ मिलती है !

कुम्भा के समय में मेवाड़ और व्यापार (Mewar and trade during the time of Maharana Kumbha)

आर्थिक दृष्टि से भी महाराणा कुम्भा के समय में मेवाड़ अत्यधिक समृद्धशाली था ! उसके शासनकाल में व्यापार तथा वाणिज्य की पर्याप्त उन्नति हुई ! महाराणा कुम्भा के अच्छे शासन के कारण बहुत से बड़े-बड़े व्यापारी बाहर से आकर मेवाड़ में बस गये थे ! इस समय चित्तौड़, देलवाड़ा, भीलवाड़ा, मांडलगढ़, बदनौर, केलवाड़ा, सज्जनपुर, आघाट यह प्रमुख व्यापारिक नगर थे ! वास्तव में यही आर्थिक समृद्धि मेवाड़ की कला तथा साहित्य के विकास के लिए उत्तरदायी थी ! कुम्भा एक सफल सेना नायक ही नहीं, एक कुशल राजनीतिज्ञ तथा कूटनीतिज्ञ भी था ! राजपूत वीरों की तरह युद्ध में लड़ते-लड़ते मर जाने में ही उसका विश्वास नहीं था !

महाराणा कुम्भा की युद्ध नीती और आक्रमण (War policy and invasion of Maharana Kumbha)

कुम्भलगढ़ प्रशस्ति के अनुसार महाराणा कुम्भा युद्ध में साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति का प्रयोग करता था ! आवश्यकता पड़ने पर वह गुरिल्ला-पद्धति का अनुसरण करते हुए पहाड़ों में छिपकर शत्रु पर अचानक आक्रमण करता था ! अपने शासन के प्रारम्भिक काल में गुजरात तथा मालवा की शत्रुता का लाभ उठाकर, उसने गुजरात में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी ! कि गुजरात का सुल्तान मेवाड़ पर आक्रमण कर ही नहीं सका ! गुजरात के सुल्तान को मेवाड़ पर कभी आक्रमण नहीं करने दिया !

उसके शत्रु दिल्ली तथा गुजरात के सुल्तानों तक ने उसे हिन्दू सुरत्ताण की उपाधि दी थी ! उसने अपने शत्रुओं को कभी एक-दूसरे से नहीं मिलने दिया ! वह राज्य को आवश्यकता से अधिक बढ़ाने में भी विश्वास नहीं रखता था ! उसने जीते हुये प्रदेशों को वापिस लौटाकर वहाँ से केवल वार्षिक कर लेना स्वीकार किया ! वह प्रदेश है बून्दी, सिरोही, नागौर इन राज्यों को अपने राज्य में नहीं मिलाया ! कुम्भा एक व्यावहारिक राजनीतिज्ञ था ! वह जानता था कि मेवाड़ की शक्ति एवं साधन दूरस्थ प्रान्तों को अपने नियोजनाये रखने के लिए पर्याप्त नहीं है !

इसी कारण उसने गुजरात तथा मालवा को विजित करने की योजना नहीं बनाई  ! पहा सरदारों को जागीरें देकर प्रसन्न रखता था ! इस प्रकार स्पार होता है कि राजनीति युद्ध-कोशल में राणा अपने समय का एक अदितीय व्यक्ति था !

महाराणा कुम्भा के शासन के समय में भारतीय वास्तुकला का संचार ( Maharana Kumbha)

मेवाड़ के लिए कम्मा का शासन लावाद रहा और महाराणा की बहुमुखी प्रतिमा में राज्य को प्रत्येक क्षेत्र में प्रमाणित किया ! निसन्देह कुम्भा की राजनैतिक तथा सामरिक सफलताये विशेष महत्व रखती है ! परन्तु फिर भी कुम्भा की महत्ता उसकी सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण है ! यह स्वयं विद्वान ही नहीं, वरन् विद्वानों का संरक्षक भी था ! विद्या की उन्नति तथा कला की अभिवृद्धि में विशेष रुचि रखने के कारण उसने साहित्य, भाषा, दर्शन, कला, नाट्यशास्त्र, संगीत में नव-चेतना का संचार किया !

कुम्भा के समय में इन विविध कलाओं की जितनी उन्नति हुई उतनी मेवाड़ के इतिहास में और किसी के समय में नहीं हुई ! वास्तव में इस समय दिल्ली सुल्तानों की कट्टर इस्लाम-भावनाओं ने कला के विविध स्वरूपों के विकास में बाधा उत्पन्न की ! तथा उन्हें विकसित नहीं होने दिया ! इस समय कुछ स्थानीय शासकों ने परम्परागत भारतीय कला को उन्नत करने का प्रयत्ल किया !

परन्तु वह प्रयत्न नाम-मात्र का ही था ! ऐसे समय में राणा कुम्भा ने देवालय, दुर्गों तथा राजप्रासादों का निर्माण कराकर भारतीय वास्तुकला की परम्परा को ! न केवल बनाये रखा, बल्कि उसकी श्रीवृद्धि करने में भी उसने अपना विशेष योगदान दिया !

संगीत और साहित्य में कुम्भा का व्यक्तिगत योगदान (Maharana Kumbha in hindi)

संगीत तथा साहित्य के क्षेत्र में महाराणा कुम्भा का व्यक्तिगत योगदान भी महत्त्वपूर्ण था ! कुम्भा शासनकाल में मेवाड़ ने बहुर्मुखी उन्नति की  कुम्भा के कला-प्रेमी तथा साहित्य अनुरागी होने में किसी को भी सन्देह नहीं ! यदि हम उसकी उपलब्धियों का समुचित मूल्यांकन करें तो हम कुम्भा को हिन्दू शासकों में महान शासक के रूप में पायेंगे !

अपनी इन उपलब्धियों के कारण ही वह जनता में लोकप्रिय तथा जनता की श्रद्धा का भाजन था !  महाराणा कुम्भा जैसा वीर और युद्ध-कुशल था, वैसा ही कह पूर्ण विद्यानुरागी था ! वह स्वयं बड़ा विद्वान् था और विद्वानों का सम्मान करने वाला था !   सांस्कृतिक क्षेत्र में मेवाड़ को कुम्भा की देन अभूतपूर्व थी !

महाराणा कुम्भा के ऐतिहासिक स्रोत (Historical sources of Maharana Kumbha)

राणा कुम्भा के शासन की जानकारी हमें उसके राज्य के बारे में किसी न किसी प्रकार की जानकारी देते हैं ! इसके अलावा कुम्भा द्वारा लिखित साहित्यिक-ग्रन्थ तथा उसके समकालीन ग्रन्थों से उसके 35 वर्षीय शासनकाल की जानकारी प्राप्त करने में सहायता मिलती है ! जयदेव के ‘गीत-गोविन्द’ की टीका के में कुम्भा द्वारा लिखित ‘रसिक-प्रिया’ में कुम्भा की विभिन्न उपाधियों तथा उपलब्धियों की जानकारी मिलती है ! ‘एकलिंग-महात्म्य’ उसके शासन-काल का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है !

इसका प्रथम भाग जो ‘राजवर्णन’ के नाम से जाना जाता है, महाराणा कुम्भा स्वयं ने लिखा था ! तथा इसका दूसरा भाग उसके निर्देशन में लिखा गया था ! कुम्भलगढ़ दुर्ग में ‘नामदेव’ के मन्दिर से तीन चट्टानों पर उत्कीर्ण ‘कुम्भलगढ़ प्रशस्ति’ प्राप्त हुई है ! यह प्रशस्ति मौलिक रूप में पत्थर की पाँच चट्टानों पर उत्कीर्ण करवाई गई थी, जिसमें से चट्टानें नष्ट हो चुकी हैं। इस प्रशस्ति से हमें कुम्भा की राजनीतिक उपलब्धियों, राज्य-विस्तार उपाधियों, साहित्यिक रचनाओं, कुम्भा द्वारा निर्मित दुर्गों तथा उनमें बनवाई गई इमारतों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है ! 

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित ‘कीर्ति-स्तम्भ’ का शिलालेख भी महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है ! इसमें ‘कुम्भलगढ़ प्रशस्ति’ की बहुत-सी घटनाओं की पुनरावृत्ति हुई है ! इस शिलालेख में राणा कुम्भा की गुजरात व मालवा विजय, उसका पड़ोसी राज्यों से संघर्ष, महाराणा कुम्भा द्वारा धर्म तथा संस्कृति की रक्षा के लिए किये गये प्रयत्नों तथा मेवाड़ के सामन्तों की स्थिति के विषय में जानकारी मिलती है ! अधिकांश अभिलेख कुम्भा के समकालीन हैं ! वे संस्कृत-भाषा में लिखे हुए हैं तथा ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यधिक मतवपूर्ण है ! 

राणा कुम्भा की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ (Initial difficulties of Maharana Kumbha)

महाराणा मोकल की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र कुम्भा 1433 ई. में मेवाड़ का राणा बना ! शिलालेखों में कुम्भा की माता का नाम सौभाग्यदेवी मिलता है ! मोकल की हत्या के समय कुम्भा भी वहाँ पर मोजूद था ! षड़यन्त्रकारी कुम्भा को भी मारना चाहते थे, किन्तु कुम्भा वहाँ से सावधानी से भाग निकला और वह चित्तौड़ पहुँचने में सफल हो गया ! मोकल के स्वामी-भक्त सामन्तों ने उसे राणा घोषित कर दिया !  राजकुमार कुम्भा ने राणा बनते ही अपने आपको चारों ओर कठिनाइयों से घिरा पाया ! सबसे बड़ी कठिनाई उसे अपने पितामह के पुत्रों चाचा व मेरा से थी !

इन दोनों ने अन्य सामन्तों के साथ मिलकर उसके पिता मोकल की हत्या की थी ! वह इससे भी सन्तुष्ट नहीं हुए थे ! और किसी भी प्रकार मेवाड़ राज्य पर अपना अधिकार जमाना चाहते थे ! अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने महपा पंवार को अपने पक्ष में कर लिया था ! तथा मोकल की हत्या के बाद वे दक्षिण के पट्टी-कोटरा के पर्वतीय क्षेत्र में छिपकर स्थानीय भीलों की सहायता से ! अपनी शक्ति को सुदृढ़ व संगठित करने का प्रयास कर रहे थे !

  • महाराणा कुम्भा ने अपने पिता की हत्या का बदला (Rana Kumbha)

महाराणा कुम्भा के लिए इन पितृ-हन्तों से बदला लेना आवश्यक था ! इसके अलावा उसके बढ़ते प्रभाव से वंश-परम्परा से सम्मानित पुराने सामन्त भी प्रसन्न नहीं थे ! पर चाचा और मेरा का खुलकर विरोध नहीं कर रहे थे उसे उनका भी मुकाबला करना था ! मालवा व गुजरात के मुस्लिम शासक मोकल के शासनकाल में ही मेवाड़ के समीप के प्रदेशों पर ! अपना अधिकार करने का प्रयास करने लग गये थे ! पड़ोसी राजपूत शासक भी इस स्थिति का लाभ उठाते हुए ! मेवाड़ के क्षेत्रों को हड़पने का प्रयास करने लगे ! इन परिस्थितियों में उसे प्रबल सहारे की आवश्यकता थी और वह आवश्यकता उसने अपने मामा रणमल को मण्डोर से बुलाकर पूरी की !

महाराणा कुम्भा के मामा राव रणमल की प्रतिज्ञा (Rana Kumbha hindi)

राव रणमल का मेवाड़ आना-महाराणा मोकल के मारे जाने का समाचार सुनकर ! मंडौर के राव रणमल ने अपने सिर से पगड़ी उतार कर ‘फैंटा’ बाँध लिया ! और प्रतिज्ञा की कि जब तक चाचा और मेरा मारे न जावेंगे, तब तक मैं सिर पर पगड़ी धारण नहीं करूँगा ! राणा कुम्भा को भी ऐसे दृढ़-प्रतिज्ञ सहायक की ही आवयश्यकता थी ! मेवाड़ आकर रणमल ने महाराणा से भेंट की और महाराणा को विश्वस्त किया कि वह उनके मन्तव्य को पूर्ण कराने में पूर्ण सहयोग देगा ! रणमल के आने पर कुम्भा ने उसके साथ मिलकर पिता के हत्यारों के विरुद्ध कदम उठाने की योजना बनाई !

राठौड़ सेना तथा सिसोदिया सेना को संयुक्त रूप से उसने चाचा व मेरा के विरुद्ध भेजा ! सेना ने भीलों को अपनी ओर मिलाकर जिस पहाड़ी भाग में वे दोनों छिपे थे, उसे घेर लिया ! चाचा व मेरा मारे गये व उनके समर्थक भागकर मांडू के सुल्तान की शरण में चले गये ! भागकर जाने वालों में चाचा का पुत्र एक्का और महपा पंवार भी थे ! भविष्य में वे मांडू के शासक को मेवाड़ पर आक्रमण करने को उकसाने का प्रयत्न करते रहे !

लेकिन मेवाड़ को जो उनसे उस समय भय था, वह अब समाप्त हो गया था ! इस प्रकार महाराणा कुम्भा ने तीन पीढियों से चली आ रही समस्या को समाप्त कर दिया तथा मेवाड़ को दल-बन्दी में विभाजित होने से बचा लिया ! और अपने पिता को मारने वालों से बदला लेकर अपनी क्रोधाग्नि को शान्त किया !

कुम्भा ने अपने पिता की हत्या का बदला लेने के बाद (Mewar Maharana Kumbha)

राणा कुम्भा ने रणमल की सहायता से अपने पिता के हत्यारों का दमन किया ! जिसके फलस्वरूप मेवाड़ की राजनीति में रणमल का प्रभाव फिर से बढ़ने लगा ! रणमल ने अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए चित्तौड़ के महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर अपने विश्वास-पात्रों को नियुक्त करना प्रारम्भ किया ! उसे यह विश्वास था कि मेवाड़ की समृद्धि से वह अपना शक्ति मजबूत कर सकता है !

इसमें सन्देह नहीं कि रणमल ने राणा कुम्भा की महत्त्वपूर्ण सेवा की ! रणमल ने राणा कुम्भा के विरोधी नरेशों को दबाने में भी सहायता दी थी; परन्तु फिर भी राणा कुम्भा रणमल के बढ़ते हुए प्रभाव से चिन्तित था ! विशेषकर जब रणमल ने के भाई राघवदेव को, जो स्थानीय सरदारों का नेता था ! षड़यन्त्र से मरवा दिया, तब राणा उसके प्रति अत्यधिक सशंकित हो उठा !

राघवदेव को मरवाने का कारण यह था कि चाचा औरमेरा के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करते समय ! उनके पक्षधरों राजपूतों की लड़कियों को रणमल अपने कैम्प में ले गया ! और अपने राठौर सामन्तों से कहा कि इन लड़कियों को वह अपने अन्तःपुर में डाल लें ! जब राघवदेव को रणमल के इस कुकृत्य का पता चलाके डेरे में गया और उन लड़कियों को अपने डेरे में ले आया ! इस घटना से रणमल राघवदेव उनके विरोधी हो गये ! उसने राघवदेव के विरुद्ध महाराणा के कान भरना आरम्भ किया !

कुम्भा के सामने राघवदेव को मरवा दिया (Kumbha)

राणा उसके प्रभाव में आ गया और एक दिन अंगरखा पहनते समय ! राघवदेव को महाराणा कुम्भा के सामने ही दो राजपूतों द्वारा रणमल ने मरवा दिया ! इसके अलावा जब रणमल ने राठौड़ सैनिकों में वृद्धि करना आरम्भ कर दिया ! तो राणा कुम्भा उसकी शक्ति से और भी भयभीत हो गया ! उसे डर था कि अगर वह रणमल की शक्ति को कम नहीं करेगा तो स्थानीय सरदारों में असन्तोष बढ़ जायेगा ! ऐसी स्थिति में महाराणा कुम्भा को अपने राज्य में उनसे कोई सहयोग नहीं मिल सकेगा ! अत: कुम्भा ने रणमल के विरुद्ध सिसोदिया गुट का समर्थनकरना शुरू कर दिया ! उसने अपने विरोधी चाचा के पुत्र अक्का व महपा पंवार को क्षमादान देकर !

  • शरणागत के रक्षक राणा कुम्भा (Biography of Rana Kumbha in Hindi Jivani)

उन्हें मांडू से चित्तौड़ लौटने की अनुमति दे दी ! मेवाड़ में वह रणमल के बढ़ते प्रभाव से दुःखी होकर महपा और एक्का स्वयं मालवा से आकर महाराणा के चरणों में आ गिरे ! और अपने अपराध की क्षमा माँगी ! महाराणा कुम्भा ने उन्हें क्षमा कर दिया उनका मेवाड़ आना रणमल को अच्छा नहीं लगा ! जब इस विषय में रणमल ने महाराणा से अर्ज किया तो प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा हम शरणागत के रक्षक कहलाते हैं ! ये हमारी शरण में आ गये हैं और हमने इनको क्षमा कर दिया है ! इसके बाद चूण्डा भी मेवाड लौट आया !

अन्त में स्थानीय सरदारों ने रणमल की प्रेमिका भारमली की सहायता से ही 1438 ई. में उसकी हत्या करवा दी ! कहा जाता है कि भारमली ने शराब पिलाकर पहले अपने प्रेमी रणमल को बेसुध कर दिया ! उसके बाद उसे पलंग से बंधवा कर वध करवा दिया ! महाराणा ने रणमल का प्रत्यक्ष रूप से तो कोई विरोध नहीं किया ! किन्तु सरदारों के द्वारा की जाने वाली दलबन्दी का समय-समय पर वह समर्थन करता रहा ! बिना कुम्भा की आज्ञा के अक्का व चूण्डा का मेवाड़ लौटना सम्भव नहीं था ! अपनी दूरदर्शिता के परिणामस्वरूप वह सफल हुआ ! 

राणा कुम्भा की पश्चिमी प्रदेशों की विजय

  •  आबू और सिरोही की विजय –

आबू और सिरोही का क्षेत्र देवड़ा शासकों के अधिकार में था सिरोही का तत्कालीन शासक सहसमल था ! 1422 ई. में आधुनिक नगर सिरोही बसाकर 1451 ई. में उसी ने इसे अपनी राजधानी बनाया था ! अपने पिता शिवभाण की भाँति वह भी बहुत महत्त्वाकांक्षी था ! मोकल के अन्तिम दिनों में मेवाड़ की अव्यवस्था का लाभ उठाकर उसने पिण्डवारा तथा उसके आस-पास के कई गाँव जीत लिये थे ! इसके अलावा देवड़ा चौहानों का व्यवहार भी मेवाड़ के प्रति सम्मानजनक नहीं था !

इन गाँवों को पुनः अधिकृत करने का बहाना बनाकर राणा ने डोडिया सरदार नरसिंह को के अनुसार मेवाड़ के पश्चिमी और पूर्वी पड़ोसी राज्यों के ! कुछ भागों को कुम्भा ने  1437ई. में सिरोही पर आक्रमण करने के लिए भेजा ! लेकिन इस आक्रमण का वास्तविक कारण ‘आबू तथा सिरोही के पूर्वी भाग पर अधिकार कर ! गुजरात के विरुद्ध मेवाड़ की सीमा को सुदृढ़ करना था ! इसके अतिरिक्त आबू का प्रान्त एक सैनिक छावनी का कार्य कर सकता था ! डोडिया ने बड़ी शीघ्रता से आबू तथा उसके आस-पास के प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया ! आबू, बसन्तगढ़ व पूर्वी सिरोही के कुछ भाग पर भी मेवाड़ का अधिकार हो गया !

इसकी पुष्टि वहाँ मिले शिलालेखों से होती है ! मेवाड़ की पश्चिमी सीमा की निगरानी के लिये उसने आबू में एक सेना भी रखी ! सिरोही के राजा सहसमल ने इसे वापस लेने के अनेक प्रयत्न किये !उसने सुल्तान से भी सहायता माँगी परन्तु वह आबू तथा सिरोही के पूर्वी राज्यों पर अधिकार करने में सफल नहीं हो सका ! 

राणा कुम्भा मण्डौर और सोजत की विजय –

रणमल की मृत्यु के बाद उसका लड़का जोधा जान बचाकर मारवाड़ भाग गया ! और चूण्डा ने जोधा का पीछा किया और भागते हुए उसने राठौड़ सैनिकों पर चित्तौड़ के पास आक्रमण कर दिया ! अनेक रा ड़ इस युद्ध में मारे गये तथा कुछ राठौड़ मारवाड़ भाग गये ! चूण्डा बराबर उसका पीछा करता रहा ! अर्बली के पास युद्ध में उसने जोधा को हराया तथा मण्डौर और सोजत पर अधिकार कर लिया !

मण्डौर का प्रबन्ध अपने पुत्र कुन्तल को सौंप कर चूण्डा चित्तौड़ लौट आया ! जोधा ने कई बार मण्डौर पर अधिकार करने का प्रयत्न किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली ! 15 वर्ष तक महाराणा कुम्भा का मण्डौर पर अधिकार रहा ! अन्त में हंसाबाई के समझाने पर कुम्भा ने मण्डौर व सोजत जोधा को लौटा दिये !  वास्तव में गुजरात तथा मालवा के लगातार आक्रमणों ने महाराणा कुम्भा को अनुभव करा दिया था !

कि मेवाड़ की भलाई जोधा के साथ समझौता कर लेने में ही है ! इधर मेवाड़ के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाये रखने के उद्देश्य से जोधा ने अपनी पुत्री शृंगारदेवी का विवाह महाराणा कुम्भा के लड़के ! रायमल से कर पुरानी शत्रुता को समाप्त कर दिया ! इस प्रकार पन्द्रह वर्ष तक कुम्भा का मारवाड़ पर अधिकार रखना मेवाड़ का राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने में लाभदायक सिद्ध हुआ !

राणा कुम्भा पूर्वी प्रदेशों की विजय –

  • हाड़ौती विजय –

हाड़ौती राज्य मेवाड़-मालवा तथा दिल्ली के मध्य स्थित था जहाँ राजा हाड़ा राज्य करते थे ! हाडौती बून्दी का भू-भाग चौहान राजपूतों की हाड़ा शाखा का प्रभाव क्षेत्र था ! हाड़ा राजपूतों के कारण ही यह क्षेत्र हाड़ौती कहलाया ! यहाँ के शासक नाडौल के चौहान शासक आसराज के छोटे पुत्र माणिक्यराय के वंशज थे ! बून्दी के शासक मेवाड़ के सामन्त थे, किन्तु मोकल के अन्तिम दिनों में वे स्वतन्त्र हो गये थे ! महाराणा कुम्भा के समकालीन बून्दी के शासक बैरीशाल और भाण थे ! और हाड़ा-शासकों ने मेवाड़ के पूर्वी सीमावर्ती दुर्ग माण्डलगढ़ और जहाजपुर पर अधिकार कर लिया था !

पूर्वी सीमा की रक्षा के लिए मेवाड़ के राणा द्वारा उन्हें वापिस लेना आवश्यक था ! यही नहीं मालवा के सुल्तान होशंगशाह ने जब मेवाड़ पर आक्रमण किया,तब हाड़ा नरेश सुल्तान की तरफ से मेवाड़ के विरुद्ध लड़े थे ! इसके अतिरिक्त बून्दी के शासक भाण का भाई सांडा कोटा का शासक था ! जो भाण की इच्छा के विरुद्ध राणा कुम्भा से मिला हुआ था ! भाण ने कोटा का राज्य भी अपने लिये प्राप्त करने के लिये मालवा के सुल्तान से सहायता माँगी ! वह इस सहायता के बदले उसे एक लाख बीस हजार टका देना स्वीकार किया !

उधर सांडा ने अपनी रक्षा के लिए महाराणा कुम्भा से सहायता माँगी ! कुम्भा ने सेना भेजकर गागरौन और माण्डलगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया ! और बून्दी के शासक को अपना ‘करदाता बनाकर उसका राज्य वापिस दे दिया ! बून्दी विजय का उल्लेख राणपुर के जैन मन्दिरवाले लेख (वि.सं. 1496) तथा कुम्भलगढ़ के लेख (वि.सं. 1517) में मिलता है ! इस विजय में माण्डलगढ़ की विजय अति महत्त्वपूर्ण रही क्योंकि वह स्वतन्त्रता प्राप्ति तक मेवाड़ के अधिकार में ही बना रहा ! इस प्रकार मेवाड़ के पूर्वी सीमान्त पर मित्र-राज्य स्थापित कर कुम्भा ने अपनी बुद्धिमत्तापूर्ण नीति का परिचय दिया ! 

पूर्वी राजस्थान की विजय (Maharana Kumbha Conquest of Eastern Rajasthan)

चौहानों के पतन के बाद अलवर, जयपुर, टोंक, सवाई माधोपुर इन स्थानों पर मुसलमानों का प्रभाव स्थापित हो गया था ! पूर्वी राजस्थान में रणथम्भौर और आमेर की विजय महाराणा कुम्भा की महत्त्वपूर्ण विजयों में से थी ! उसने रणथम्भौर का दुर्ग मालवा के सुल्तान महमूद खलजी को परास्त कर प्राप्त किया ! आमेर में कायमखानी मुसलमानों को हराकर उसने आमेर जीत लिया ! और उसे आमेर के कछवाहा शासक उद्दरण को दे दिया ! इसके अतिरिक्त महाराणा कुम्भा ने टोंक तथा अलवर पर भी अपना प्रभाव स्थापित किया !

राणा कुम्भा की अन्य विजयें (Victory of Maharana Kumbha)

कुम्भलगढ़ प्रशस्ति के अनुसार महाराणा कुम्भा ने राजस्थान के कुछ और नगरों को भी जीता था ! इन नगरों के स्थानीय नाम ज्ञात नहीं हैं !  इन स्थानीय नगरों के नाम शोध्यानगरी, हमीरपुर, वायसपुर, धान्य नगर, वीसलनगर, नारदीय नगर तथा सिंहपुरी हैं ! इसके अतिरिक्त महाराणा कुम्भा ने बदनोर के आस-पास बसने वाले मेरों का कठोरता से दमन किया ! क्योंकि मेरों ने मेवाड़ के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था ! डूंगरपुर के राज्य को जो मोकल के समय में स्वतन्त्र हो गया था ! और पुनः मेवाड़ राज्य में मिला लिया ! इस प्रकार महाराणा कुम्भा ने एक व्यापक क्षेत्र पर अधिकार कर मेवाड़ साम्राज्य की नींव डाली ! 

महाराणा कुम्भा की साहित्यिक उपलब्धियाँ (Literary Achievements of Maharana Kumbha)

कुम्भा एक वीर योद्धा तथा कुशल प्रशासक ही नहीं बल्की एक साहित्य प्रेमी भी था ! एकलिंग महात्म्य में उसको वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद्, व्याकरण, राजनीति और साहित्य में निपुण बताया है ! वह स्वयं विद्वान् था तथा मराठी, मेवाड़ी, कन्नड़, संस्कृत, गुजराती इन कई भाषाओं का वह ज्ञाता था ! स्पष्ट है कि वह नाट्य शास्त्र का भी अच्छा ज्ञाता था ! दुर्भाग्यवश इन नाटकों की प्रतिलिपियाँ तो उपलब्ध नहीं हैं परन्तु कीर्ति-स्तम्भ प्रशस्ति में इनका संकेत मिलता है ! महाराणा कुम्भा वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद् तथा व्याकरण का अच्छा जानकार था !

उसकी कुछ रचनायें धर्म से और कुछ रचनायें संगीतकला से सम्बन्धित हैं  ! उसकी धार्मिक रचनायें मौलिक नहीं अपितु टीका के रूप में हैं ! इन टीकाओं से एक ओर महाराणा कुम्भा की काव्य-कुशलता का आभास होता है तो दूसरी ओर उसके धर्म के प्रति अनुराग का भी आभास होता है ! कुम्भा केवल विद्वान् ही नहीं बल्की विद्वानों का आश्रयदाता भी था ! मण्डन नामक शिल्पशास्त्री को कुम्भा के दरबार में आश्रय प्राप्त था !

उसने वास्तुकला के सम्बन्ध में ‘देवता मूर्ति प्रकरण’, ‘प्रासाद मण्डन’, ‘राजवल्लभ’, ‘रूप-मण्डन’, ‘वास्तु-मण्डन’ इन कई ग्रन्थों की रचना की है ! और मण्डन का भाई नाथा भी शिल्पशास्त्री था ! उसने ‘वास्तु मञ्जरी’ लिखी ! मण्डन के पुत्र गोविन्द ने ‘उद्धारधोरिणी’, ‘कलानिधि’ और ‘द्वारदीपिका’ इनकई ग्रन्थों की रचना की ! राणा का यह विद्या-प्रेम ही था जिसके कारण उस काल में शिक्षण संस्थाओं का जाल बिछा था ! अत्रि, कवि और महेश कीर्ति-स्तम्भ प्रशस्ति के रचयिता थे ! इन तीनों में अत्रि का स्थान विशेष है ! वह काव्य-शास्त्र का आलोचक भी था !

अधिक महाराणा कुम्भा की उपलब्धियाँ के बारे में जाने –

 मीमांसा, न्याय और वेदान्त में उसने विशेष योग्यता प्राप्त कर रखी थी ! अत्रि की मृत्यु हो जाने पर उसके पुत्र महेश ने ‘कीर्ति-स्तम्भ’ की प्रशस्ति को पूर्ण किया ! महाराणा कुम्भा ने जय और अपराजित के मतानुसार कीर्ति-स्तम्भों की रचना का एक काव्य बनाया ! और उसे शिलाओं पर खुदवा कर अपने कीर्ति-स्तम्भ के नीचे के हिस्से में बाहर की तरफ कहीं लगवाया था ! इसीलिए महेश पर राणा जी की विशेष कृपा थी ! कान्ह व्यास ‘एकलिंग महात्म्य’ का लेखक था ! तथा वह राजा का वैतनिक कवि था !

कुम्भा के काल में कई जैन विद्वान् भी हुये जिन्होंने धार्मिक तथा काव्यात्मक रचनाओं द्वारा उस युग की शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाया ! उन जैन विद्वानों में सोमसुन्दर, मुनि सुन्दर, भुवन सुन्दर जयचन्द्र सूरी, सोमदेव के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं ! इसके अतिरिक्त अनेक विविध विषयक विद्वान्, ज्योतिषी, चिकित्सा-शास्त्री  यह सब कुम्भा के दरबार की शोभा बढ़ाते थे ! साहित्य के क्षेत्र में इस काल की एक और विशेषता यह थी कि मेवाड़ी भाषा को भी आश्रय प्रदान किया गया ! इसलिए राजकीय आदेशों तथा ताम्रपत्रों में मेवाड़ी भाषा का भी प्रयोग किया गया है !

कुम्भा के काल में साहित्य की जो आश्चर्यजनक उन्नति हुई उसके कई कारण थे ! प्रथम, मेवाड़ में प्राचीनकाल से ही अनेक विद्वान् व साहित्यकार साहित्य सृजन करते आ रहे थे ! द्वितीय, मेवाड़ सीमा के गुजरात तथा मालवा की सीमाओं से मिल जाने के कारण ! मेवाड़ की प्राचीन परम्पराओं का गुजरात व मालवा की सांस्कृतिक परम्पराओं से सम्बन्ध स्थापित हो गया था ! इन विचारों के आदान-प्रदान ने भी साहित्य के विकास में सहयोग दिया ! इसके अलावा कुम्भा स्वयं की उदार सांस्कृतिक रुचि, कला-संरक्षण की भावना, विद्यानुराग का भी साहित्यिक विकास के प्रमुख कारण थे ! 

संगीत-कला –

महाराणा कुम्भा के काल में संगीत-कला की भी पर्याप्त उन्नति हुई ! वह स्वयं उच्चकोटि का संगीतज्ञ था ! उसने अपने संगीत के अध्ययन तथा कला के गहन ज्ञान का परिचय ‘संगीत मीमांसा’ , ‘संगीतराज’ तथा सुधा प्रबन्ध इन ग्रन्थों की रचना करके ! तथा चण्डीशतक की व्याख्या व गीत गोविन्द पर रसिक प्रिया नाम की टीका रचकर दिया है ! इसके अलावा राणा कुम्भा ने संगीत-रत्नाकर’ की टीका भी लिखी ! एकलिंग महात्मय में विभिन्न राग-रागनियों पर आधारित विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुतियाँ संग्रहित हैं ! जिनकी रचना महाराणा कुम्भा स्वयं ने की थी !

इस काल की बनी हुई मूर्तियों से भी हमे संगीत की स्थिति का ज्ञान होता है ! रणकपुर, चित्तौड़, देलवाड़ा, एकलिंग आदि स्थानों पर प्राप्त प्रतिमाओं में संगीत मण्डलियों तथा वादक मण्डलियों की प्रतिमायें दृष्टव्य हैं ! जो इस बात की पुष्टि करती हैं कि संगीत का प्रचलन उस काल में जन-सामान्य में भी था तथा मृदंग, शृंग, झांज इन वाद्य-यन्त्र तत्कालीन समाज में लोकप्रिय थे ! वह वीणा बजाने में आति निपुण था !

महाराणा कुम्भा की मृत्यु (Death of Maharana Kumbha)

महाराणा कुम्भा जैसे महान तथा प्रतिभा-सम्पन्न राणा के जीवन का अन्त बहुत ही करुणाजनक था ! जीवन के अन्तिम दिनों में वह मानसिक दृष्टि से विक्षिप्त हो गया था ! इसका कारण उसको मानसिक रोग होना था वह योग्य उत्तराधिकारी अभाव से भी विक्षुब्ध था ! ऐसी अवस्था में महाराणा कुम्भा के बड़े पुत्र उदा (उदयकरण) ने सिंहासन पर अधिकार करने का निश्चय किया ! और जब एक दिन कुम्भा कुम्भलगढ़ दुर्ग में स्थित भामादेव के मन्दिर के निकट ईश्वर भक्ति में मग्न बैठा था ! तब उदा ने पीछे से राणा पर कटार का वार कर, 1468 ई. में उसकी हत्या कर दी !

कुछ विद्वानों की यह मान्यता है कि कुम्भा के चाचाओं ने उदा को इस निकृष्ट कार्य करने के लिए उकसाया था ! महाराणा कुम्भा की मृत्यु के साथ ही मेवाड़ की कला, साहित्य, राजपूत शौर्य इन सभी की परम्परा में अवरोध उत्पन्न हो गये ! राणा कुम्भा की मृत्यु के साथ ही मेवाड़ की इस सर्वतोमुखी उन्नति का अन्त दिखाई देता है ! यह सांस्कृतिक विकास आगे चलकर राजसिंह के समय में फिर दिखाई देने लगा था ! 

FAQ’s

Maharana Kumbha की कितनी रानियां थी?

महाराणा कुम्भा की 1600 रानियां थी

महाराणा कुंभा ने कितने दुर्गों का निर्माण करवाया?

महाराणा कुंभा ने 32 दुर्गों का निर्माण करवाया?

राणा मोकल के पिता का नाम क्या है?

राणा मोकल के पिता का राणा लाखा तथा माता का नाम रानी हंसाबाई था

Maharana Kumbha की हत्या कैसे हुई?

एक दिन कुम्भा कुम्भलगढ़ दुर्ग में स्थित भामादेव के मन्दिर के निकट ईश्वर भक्ति में मग्न बैठा थे! तब उदा ने पीछे से राणा पर कटार का वार कर, 1468 ई. में उसकी हत्या कर दी !

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top